अभिमन्यु का वध कैसे हुआ ? How Abhimanyu died ?

Abhimanyu fights

 


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महाभारत में ऐसा योद्धा जिसकी आयु सबसे कम थी, लेकिन फिर भी उसकी वीरता को देख खुद कौरव भी हैरान थे। प्रिये भक्तों हम बात कर रहे हैं अभिमन्यु की और आज हम अभिमन्यु की वीरगति की कथा प्रस्तुत करेंगे। 


Mahabharat ke yudh ka 12th din

महाभारत के युद्ध के बारवेह दिन के समाप्त होने के बाद जब सभी कौरव सैनिक युद्ध में पराजित होकर वापस लौट रहे थे तो उनकी  छिन्न भिन्न अवस्था देख कर दुर्योधन मन ही मन बहुत शोकाकुल हो गया।  अगले दिन प्रातः काल दुर्योधन ने द्रोणाचार्य के पास जाकर इस प्रकार कहा - "गुरु श्रेष्ठ निश्चित ही आप हम लोगों को अपना शत्रु मानते हैं और पांडवों के प्रति प्रेम रखते हैं क्यूंकि यदि रणक्षेत्र में आप किसी को पकड़ना चाहें तो चाहे सम्पूर्ण देवता ही उसकी रक्षा क्यूँ न कर रहे हों वह आपसे बच कर नहीं जा सकता फिर भी आप अपने दिए हुए वर को पूर्ण नहीं कर पा रहे हैं। इसे में क्या आशय समझूँ" ? इस्पे द्रोणाचार्य ने कहा - " राजन  तुम्हे इस तरह का विचार नहीं करना चाहिए ।  में अपनी पूरी शक्ति लगा कर तुम्हारा अभीष्ट पूर्ण करने की चेष्टा कर रहा हूँ, परन्तु एक बात याद रखो की जिसकी युद्ध क्षेत्र में  अर्जुन  रक्षा कर रहे हों उसे देवता, असुर, राक्षक, यक्ष, गन्धर्व कोई भी हानि नहीं पहुंचा सकता। राजन तुम किसी भी उपाय से अर्जुन को रणक्षेत्र से दूर हटा दो और में तुम्हे वचन देता हूँ की में आज उस व्यूह का निर्माण करूँगा जिससे पांडवों के किसी न किसी श्रेष्ठ महारथी को अवश्य मृत्यु प्राप्त होगी। तदन्तर दुर्योधन की आज्ञा से सैनिकों ने दक्षिण दिशा में जा कर अर्जुन को ललकारा और वहां; अर्जुन और उस सैनिक टुकड़ी के बीच  भयंकर युद्ध छिड़ गया जिससे अर्जुन वहां व्यस्त हो गए। उस समय द्रोणाचार्य ने रणक्षेत्र में चक्रव्यूह का निर्माण किया जिसको तोडना देवताओं के लिए भी दुर्लभ था। 


Yudhishthir aur Abhimanyu samwaad

उस समय चक्रव्यूह के कारण द्रोणाचार्य का सामना करना असंभव जानकार युधिष्ठिर ने अभिमन्यु से कहा - "हे तात तुम्हारे पिता अर्जुन युद्ध से लौटने पर निष्य ही हमारी निंदा करेंगे क्यूंकि हम लोगों में से कोई  भी इस चक्रव्यूह को भेदने की प्रक्रिया नहीं जानता । तुम, अर्जुन , श्री कृष्णा अथवा प्रद्युमन तुम चार पुरुष ही चक्रव्यूह का भेदन  कर सकते हो। अतः तुम शीघ्र ही इस सेना का विनाश कर डालो। अभिमन्यु ने कहा महाराज में चक्रव्यूह को भेद कर उसमे प्रवेश कर सकता हूँ परन्तु किसी आपत्ति में पड़ने पर में उससे बहार नहीं निकल पाउँगा क्यूंकि पिता जी ने  मुझे अभी सिर्फ चक्रव्यूह को भेदने की विधि बताई है।  


युधिष्ठिर ने कहा-तात तुम व्यूह का भेदन करते हुए हमारे लिए मार्ग बनाते जाओ हम तुम्हारी रक्षा करते हुए तुम्हारे पीछे चलते रहेंगे। तुम जहाँ जहाँ से व्यूह तोड़ दोगे हम वहां बार बार योद्धाओं का वध करके उस व्यूह को नष्ट करते रहेंगे। तब अभिमन्यु ने  कहा की आज युद्ध क्षेत्र में मैं ऐसा पराक्रम करूँगा जिससे मेरे पिता अर्जुन और मामा श्री कृष्णा सहित मेरे संपूर्ण कुल को असीम प्रसन्नता प्राप्त  होगी।  ऐसा कह कर अभिमन्यु शीघ्र ही चक्रव्यूह की और चल दिए। अभिमन्यु अभी थोड़ा ही आगे बढे थे की द्रोणाचार्य की सेना ने उन पर प्रहार करना आरम्भ कर दिया। द्रोणाचार्य के देखते देकते ही सुभद्रा नंदन अभिकमन्यू व्यूह तोड़कर अंदर प्रवेश कर गए। व्यूह के अंदर घुसते ही अभिमन्यु को हाथी सवार , घुड़ सवार, रथि और पैदल योद्धाओं ने चारों ओर से घेर लिया। 


Abhimanyu aur Kaurav sena ke beech Yudh

abhimanyu vs kauravas



दोनों औरों से बाणों  की वर्षा होने लगी और देखते ही देखते अभिमन्युं ने सभी शत्रुओं को परास्त कर दिया। अपनी सेना का विनाश होता देख दुर्योधन स्वयं अभिमन्यु की और बढ़ा।  तब द्रोणाचार्य ने समस्त कौरव योद्धाओं से कहा की तुरंत दुर्योधन की रक्षा के लिए आगे बढ़ो।  तब द्रोणाचार्य, अश्वथामा , कर्ण, शैल्य  , कृपाचार्य आदि  दुर्योधन की रक्षा के लिए बढे और अभिमन्यु पर बाणों की वर्षा करने लगे। दोनों पक्षों में फिर भीषण युद्ध छिड़ा और इस  प्रक्रिया में अभिकमन्यू द्वारा शल्य  के भ्राता की मृत्यु हो गयी। अपनी सेना की पराजय देखते हुए दुर्योधन ने फिर अपने महारथियों  से कहा की यदि गुरुवर द्रोणाचार्य  युद्ध में किसी को मारना चाहें तो स्वयं यमराज भी उसकी रक्षा नहीं कर सकते , यह मूर्ख बालक अपने प्रकाराम पर अभिमान कर रहा है।   गुरु द्रोणाचार्य इसका वध नहीं करना  चाहते क्यूंकि यह अर्जुन का पुत्र है और अर्जुन गुरु द्रोणाचार्य के प्रिये शिष्य है। दुर्योधन का यह कथन सुनकर दुशासन ने कहा की भ्राता आप चिंता न करें ; यह बालक अभी मेरे हाथों मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। ऐसा कह कर दुशाशन ने अभिमन्युं पर धावा बोल दिया। देकते ही देखते दोनों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया और अभिमन्यु ने दुशाशन को धाराशाही कर दिया। 


दुशाशन को पराजित होता देख कर्ण अभिमन्यु का वध करने की इच्छा से युद्ध में आये, कर्ण अपने पूरे पराक्रम से अभिमन्यु पर बाणों से प्रहार करने लगे परन्तु कर्ण को अभिमन्यु की निपुणता का आभास बिलकुल भी ना था, अभिमन्यु ने न सिर्फ कर्ण के प्रहारों को ध्वस्त किया बल्कि कर्ण पर आक्रमण करते हुए उन्हें चोटिल भी कर दिया कर्ण को पीड़ा में देख कर्ण के भ्राता बीच में कूद पड़े और कर्ण के प्राणो की रक्षा करते हुए अपने जीवन का बलिदान दे दिया। कर्ण के पराजित होने के पश्चात् चक्रव्यूह अब टूटने लगा था।       

Abhimanyu Ka vadh



चक्रव्यूह को टूट ता देख जयद्रथ पांडवों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए युद्ध में आया और केवल अपने ही बल बूते से चारों पांडवों को परास्त किया और उन्हें अभिमन्यु से अलग कर दिया। ऐसा जयद्रथ इसलिए कर पाया क्यूंकि जब पांडव 12 वर्ष के वनवास पर थे, तब एक दिन राजा जयद्रथ उसी जंगल में गुजरा, जहां पांडव रह रहे थे। उस समय आश्रम में द्रौपदी को अकेला देख जयद्रथ ने उसका हरण कर लिया। जब पांडवों को यह बात पता चली तो उन्होंने पीछा कर जयद्रथ को पकड़ लिया।

भीम जयद्रथ का वध करना चाहते थे, लेकिन कौरवों की बहन दु:शला का पति होने के कारण अर्जुन ने उन्हें रोक दिया। गुस्से में आकर भीम ने जयद्रथ के बाल मूंडकर पांच चोटियां रख दी। जयद्रथ की ऐसी हालत देखकर युधिष्ठिर को उस पर दया आ गई और उन्होंने जयद्रथ को मुक्त कर दिया।



पांडवों से पराजित होकर जयद्रथ अपने राज्य नहीं गया। अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह हरिद्वार जाकर भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या करने लगा। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने के लिए कहा। जयद्रथ ने भगवान शिव से युद्ध में पांडवों को जीतने का वरदान मांगा। तब भगवान शिव ने जयद्रथ से कहा कि- पांडवों से जीतना या उन्हें मारना किसी के भी बस में नहीं है। लेकिन युद्ध में केवल एक दिन तुम अर्जुन को छोड़ शेष चार पांडवों को युद्ध में पीछे हटा सकते हो। इस वरदान के बल पर जयद्रथ ने पांडवों को चक्रव्यूह में प्रवेश करने से रोक दिया। 


चारों पांडवों की गति थमते ही चक्रव्यूह की संरचना ने अभिमन्युं को पीछे की ओर से घेर लिया ओर पांडवों से अलग कर दिया, अब अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस  चुके  थे। चक्रव्यूह में फसने  के पश्चात् दुयोधन, कर्ण, शकुनि, दुशासन एवं बाकी कौरव योद्धा एक साथ अभिमन्यु से युद्ध करने लगे। इसी द्वंध युद्ध में अभिमन्यु ने दुर्योधन के बेटे लक्ष्मण का वध कर दिया  ,अभिमन्यु ओर शेष  कौरवों  के बीच  काफी समय तक घमासान युद्ध करने के बाद अब अभिमन्यु थक चुके थे, इसी अवसर का लाभ उठाते हुए अभिमन्यु को करवों द्वारा घायल कर दिया गया ओर अंततः दुशासन के पुत्र ने अपने गदा से वार कर अभिमन्यु का  वध कर दिया। तो मित्रों युद्ध के तेरहवे दिन अभिमन्यु अत्यंत वीरता वा बल का प्रदर्शन करते हुए  वीरगति को प्राप्त हो गए 

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