नमस्कार दोस्तों, हमारे ब्लॉग भक्ति वेदांत में आपका स्वागत है। प्रिये मित्रों शिखंडी का नाम तो आप सभी ने सुना ही होगा, लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं शिखंडी के स्त्री से पुरुष बन ने की कथा।
पंचाल नरेश द्रुपद ने पुत्र की अभिलाषा से महा देव जी की तपस्या की। तब महादेव जी ने उन्हें वरदान दिया की तुम्हे पहले एक पुत्री प्राप्त होगी जो बाद में पुत्र में परिवर्तित हो जाएगी । उसके बाद राजा द्रुपद को अपनी रानी से, शिखंडनी नामक पुत्री की प्राप्ति हुई। परन्तु राजा द्रुपद को महादेवजी के कथन पे विश्वास था , इसलिए उसने रानी से कह कर उस संतान के कन्या होने की बात को छुपा लिया ओर उसको एक पुत्र की तरह ही पालन पोषण किया। सब लोग उस संतान को शिखंडी के नाम से जानते थे। राजा द्रुपद ने शिखंडी के लिए सभी तरह की शिक्षा का प्रबंध किया। देखते ही देखते शिखंडी जवान हो गयी , परन्तु वह अभी तक स्त्री ही थी। यह देख द्रुपद ओर उनकी पत्नी को बहुत चिंता हुई। परन्तु उन्हें भगवन शिव के कथन पर पूर्ण विश्वास था , यह सोच कर उन्होंने शिखंडी का एक कन्या के साथ विवाह करने का निश्चय किया।
कुछ समय पश्चात् राजा द्रुपद ने शिखंडी का विवाह राजा हृण्य वर्मा की पुत्री के साथ कर दिया। विवाह संम्पन्न हो जाने के कुछ ही दिनों बाद हृण्य वर्मा की पुत्री को यह ज्ञात हो गया की शिखंडी तो स्त्री है। उसने गुप्त चरों द्वारा इस समाचार से अपने पिता को अवगत करा दिया। यह सुनकर राजा हृण्य वर्मा बहुत क्रोधित हुए। और उन्होंने राजा द्रुपद के पास सन्देश भिजवाया की आपने हमे धोका दिया है। और इस अपमान के लिए मैं शीघ्र ही तुम्हारे राज्य पर आक्रमण करके तुम्हारा नाश कर दूंगा।
यह सन्देश सुनकर महाराजा द्रुपद घबरा गए। और जा कर अपनी पत्नी से कहा की रानी, शिखंडी के कन्या होने का समाचार सुनकर हृण्य वर्मा क्रोध वश मेरे ऊपर आक्रमण करेंगे। अब मैं क्या करूँ ? अपने माता पिता को इस प्रकार शोभ मग्न होकर बात चीत करते देख शिखंडनी बहुत दुखी हो गयी और उसने सोचा मेरे माता पिता मेरे कारण ही दुखी हैं इसलिए मेरा प्राण त्याग देना ही उचित होगा। ऐसा निश्चय करके वह एक निरजन वन में चली गयी। वहां पहुँच कर उसने प्राण त्यागने के उद्देश्य से खान पान त्याग कर उपवास करने लगी। उसी वन में एक यक्ष का निवास था। शिखंडनी को उस अवस्था में देख कर यक्ष ने उससे पूछा -" हे! राजकुमारी तुम क्यों अपने प्राण त्यागने के लिए आतुर हो ?", "तुम्हारी जो भी इच्छा हो मुझे बताओ , मैं अवश्य पूर्ण करूँगा।
तब शिखंडनी ने उसे सारा वृतांत कह सुनाया। शिखंडनी बोली मेरे स्त्री होने के कारण शीघ्र ही महाराज हृण्य वर्मा मेरे माता पिता के प्राण हर लेंगे | यही मेरे दुःख का कारण है, यदि तुम मेरा दुःख दूर करना चाहते हो तो मुझे पुरुष रूप में परिवर्तित कर दो। यक्ष ने कहा, सुंदरी मैं तुम्हे कुछ समय के लिए अपना पुरुषत्व प्रदान कर सकता हूँ और तुम्हारा स्त्रीत्व स्वयं ग्रहण कर सकता हूँ, परन्तु अपने माता पिता की रक्षा के पश्चात् तुम मेरा पुरुषत्व लौटाने इसी स्थान पर आ जाना, यदि तुम प्रतिज्ञा करती हो तो मैं ऐसा कर सकता हूँ। शिखंडनी ने प्रतिज्ञा कर ली और यक्ष से पुरुषत्व प्राप्त कर अपने नगर को लौट आया। उसी समय हृण्य वर्मा अपनी सेना के साथ पांचाल की सीमा पर पहुँच गए। तब महाराज द्रुपद ने उनके पास सन्देश भजवाया निश्चित ही किसी ने आपको झूठी सूचना दी है आप स्वयं आ कर स्पष्ट कर लें की शिखंडी स्त्री है या पुरुष।
शिखंडी के पुरुष सिद्ध होजाने से हृण्य वर्मा संतुष्ट होकर वापिस लौट गए। कुछ समय तक पुरुष रहकर समय व्यतीत करने के बाद शिखंडी पुनः यक्ष के पास उसका पुरुषत्व लौटाने चल दिया। उसी अंतराल में भगवान् कुबेर उस वन से विचर रहे थे। और यक्ष से मिलने के लिए उसके महल में आये। उनको देख कर यक्ष उनका स्वागत करने के लिए उनके सामने नहीं आया। तब कुबेर ने कूपित होते हुए सेवकों से यक्ष के सामने न आने का कारन पूछा। कारण पता चलने पर कुबेर बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने यक्ष को श्राप दे दिया की अब वह अपना पुरुषत्व शिखंडी से वापिस नहीं ले पाएगा।
यह सुनकर यक्ष घबरा गया और कुबेर से अनुनय विनय करने लगा। तब कुबेर ने कहा की केवल शिखंडी की मृत्यु के पश्चात् ही उसका पुरुषत्व वापिस ग्रहण कर सकते हो। जब शिखंडी यक्ष के पास पहुंचा तो यक्ष ने उन्हें सारा वृतांत सुनाकर वापिस भेज दिया। उसके बाद शिखंडी पुरुष होकर अपने माता पिता के साथ रहने लगे और गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा प्राप्त कर एक महान योद्धा बने। उन्होंने महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से युद्ध किया और अपने पूर्व जन्म की प्रतिज्ञा तथा महादेवजी के वरदान के अनुसार भीष्म के वध का कारण बने।

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