यक्ष युधिष्ठिर संवाद। युधिष्ठिर ने कैसे अपने मृत भाइयों को जीवित किया ?

yaksh aur yudhishthir samwaad

 


नमस्कार दोस्तों हमारे चैनल भक्ति वेदांत में आपका स्वागत है। प्रिये दर्शकों आपने महाभारत में पढ़ा या देखा होगा की वनवास के दौरान युदिष्ठिर और यक्ष का संवाद होता है , अगर आप गौर करें तो  इस संवाद में जो भी प्रश्न पूछे गए उनके द्वारा मानव जाती को यह बताने की कोशिश की गयी है की उनके लिए क्या करना गलत है और क्या सही। तो आइये इस वीडियो के माध्यम से आपको यक्ष और युदिष्ठिर का संवाद बताते हैं।    



पांडव अपने तेहरेह वर्षीया वनवास के दौरान वनो में विचरण कर रहे थे। वनवास के दौरान  एक दिन वन में घुमते घुमते सभी पांडवों को प्यास लगी।  युदिष्ठर  ने नकुल से पानी की तलाश के लिए किसी वृक्ष पर  चढ़ कर जलाशय  की खोज करने को कहा।  तब नकुल ने एक ऊँचे  वृक्ष  पर चढ़ कर एक जलाशय  देखा और बड़े भाई की आज्ञा से जलाशय की तरफ चल दिए।  वहां पहुँच कर उन्होंने जैसे ही पानी पीने की चेष्टा की उनके कानो में एक वाणी सुनाई दी " हे नकुल पहले मेरे प्रश्नो का उत्तर दो फिर यह पानी पियो"।  

 नकुल बहुत प्यासे थे तो उन्होंने उस कथन की अवहेलना करके पानी पी लिया , पीते ही वे अचेत होकर  गिर पड़े।  नकुल के लौटने में विलम्भ होता देख युदिष्ठिर ने सहदेव से कहा "सहदेव नकुल को यहाँ से गए बहुत देर हो गयी है, तुम जाकर देख आओ "।  यह सुन सहदेव भी जलाशय की ओर चल दिए वहां पहुँच कर उन्होंने  देखा कि नकुल पृथ्वी वर मृत पड़े हैं।  भाई को मृत  देख सहदेव शोकाकुल हो गए परन्तु अपने बड़े भाई की आज्ञा अनुसार जल लेने के लिए आगे बढ़े तभी  उन्हें भी वही आकाशवाणी सुनाई दी " पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दो फिर यह पानी पियो" लेकिन सहदेव भी उस वाणी की अवहेलना करते हुए पानी पीने लगे और पीते ही अचेत होकर गिर पड़े। 

जब नकुल और सहदेव को गए हुए काफी समय बीत गया तब युधिष्टर ने अर्जुन से कहा की तुम उन दोनों को बुला लाओ और पानी भी लेते आओ , तात पश्चात् अर्जुन भी जल लेने सरोवर पहुंचे, वहां उन्होंने दोनों भाइयों को मृत अवस्था में देखा। तब अर्जुन दुखी और क्रोधित होकर चारों तरफ किसी हिंसक प्राणी अथवा शत्रु को खोजने लगे, जब उन्हें कोई दिखाई नहीं दिया तब अर्जुन भी थक कर पानी की और चले ,उस समय अर्जुन को भी वह आकाश वाणी सुनाई दी, "यदि तुम मेरे प्रश्नो का उत्तर दे सको तभी यहाँ का पानी पी सकते हो " तब अर्जुन ने क्रोधित होकर कहा तुम कौन हो ? सामने आओ मैं अभी अपने बाड़ों से तुम्हारे टुकड़े टुकड़े कर डालूंगा।  


ऐसा कहकर अर्जुन चारों तरफ बाणों की वर्षा करने लगे। तब यक्ष बोले  इस प्रकार बाणों की वर्षा करने से क्या लाभ? पहले मेरे प्रश्नो का उतर दो फिर यह पानी पियो।  यदि तुम मेरे प्रश्नो का उत्तर दिए बिना यहाँ का जल पियोगे तो पीते ही मर जाओगे।  परन्तु अर्जुन भी उनके वचनो की अवहेलना करते हुए जल पीने लगे और पीते ही अचेत होकर गिर पड़े। काफी समय बीतता देख युधिष्टर ने भीम से कहा " तात! नकुल सहदेव और अर्जुन को गए हुए बहुत देर हो गयी है तुम जाकर उन्हें बुला लाओ और पानी भी शीघ्र ले आओ।  तब भीम उस जलाशय पहुंचे और तीनो भाइयों को मृत अवस्था में पाया, उन्हें देखकर भीम ने सोचा की यह निश्चय ही किसी शत्रु का काम है । निश्चित ही मुझे इन शत्रुओं से युद्ध करना पड़ेगा तो अतः पहले जल पी लेता हूँ , जैसे ही भीम जल की ओर चले उन्हें भी वही आकाशवाणी सुनाई दी " हे भीम पहले मेरे प्रश्नो का उत्तर दो फिर यह पानी पियो ", लेकिन यक्ष की बातों को अनदेखा करते हुए भीम पानी पीने लगे ,  और पानी पीते ही अचेत होकर वे भी गिर पड़े। 


चारों भाइयो को गए हुए बहुत समय बीत जाने पर युदिष्ठर चिंतित हो उठे और स्वयं उस जलाशय की तरफ चले।  वहां पहुँच कर युधिष्टर ने अपने भाइयो को मृत अवस्था में पाया । यह देख कर उन्हें बहुत शोक हुआ तत्पश्चात धरम पुत्र युधिष्टर नाना प्रकार से विलाप करने लगे काफी समय शोक सागर में मगन रहने के बाद युधिष्टर अपने भाइयों की मृत्यु के संभावित  कारणों पर विचार करने लगे। उन्होंने सोचा इनके शरीरों में किसी अस्त्र शस्त्र का चिन्ह नहीं है और इस स्थान पर किसी के पैरों का निशान भी नहीं है। संभवतः यह कोई दुर्योधन अथवा शकुनि का षड़यंत्र  है। निश्चित ही इस सरोवर के पानी में जहर नहीं है क्यूंकि मेरे भाइयों के शरीर में जहर का कोई लक्षण दिखाई नहीं देता है। इसी प्रकार बहुत सोचने विचारने पर भी वे किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके। अंत में उन्होंने सोचा की मेरे इन वीर भाइयों की मृत्यु का कारण आयु पूर्ण होने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता इस प्रकार विचार करके युदिष्ठर भी जल में उतरे। तभी युधिष्टर को भी आकाशवाणी सुनाई दी । यक्ष बोले 

राजकुमार में एक बगुला हूँ और मैंने ही तुम्हारे छोटे भाइयों को मारा है। यदि तुम भी मेरे प्रश्नो का उत्तर दिए बिना जल पीने की चेष्टा करोगे तो मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे। युधिष्टर ने कहा की मेरे चार अति बलशाली भाइयों को निश्चित ही एक पक्षी नहीं मार सकता तुम कौन हो यह मुझे बताओ।  यक्ष ने कहा तुमने यथार्थ ही जाना है मैं पक्षी नहीं हूँ यक्ष हूँ और तुम्हारे चारो भाई मेरे द्वारा ही मारे गए हैं। इस जल पर पहले से ही मेरा अधिकार है अतः तुम इससे बल पूर्वक नहीं ले जा सकते हे युधिष्टर पहले मेरे प्रश्नो का उत्तर दो फिर यह पानी पियो"। युधिष्टर ने कहा तुम अपना प्रश्न करो मैं अपने बुद्धि के अनुसार तुम्हारे प्रश्नो का उत्तर दूंगा। 


यक्ष ने पूछा- “सूर्य को कौन उदित करता है? उसके चारों ओर कौन चलते हैं? उसे अस्त कौन करता है और वह किसमें प्रतिष्ठित है?"

युधिष्ठिर ने उत्तर में कहा- “हे यक्ष! सूर्य को ब्रह्म उदित करता है। देवता उसके चारों ओर चलते हैं। धर्म उसे अस्त करता है और वह सत्य में प्रतिष्ठित है।”

यक्ष ने पुनः पूछा- “मनुष्य श्रोत्रिय कैसे होता है? महत पद किसके द्वारा प्राप्त करता है? किसके द्वारा वह द्वितीयवान (ब्रह्मरूप) होता है और किससे बुद्धिमान होता है?”

युधिष्ठिर ने उत्तर में कहा- “हे यक्ष! - वेदों की श्रुति से श्रोतिय होता है ,तप से वह महत् प्राप्त करता है , धैर्य से वह द्वित्यावन होता है, बड़े जानो की सेवा से बुद्धिमान होता है। 

यक्ष का अगला प्रश्‍न था- “ब्राह्मणों में देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषों जैसा धर्म क्या है? मानुषी भाव क्या है और असत्पुरुषों का सा आचरण क्या है?”

इन प्रश्‍नों के उत्तर में युधिष्ठिर बोले- “वेदों का स्वाध्याय ही ब्राह्मणों में देवत्व है। उनका तप ही सत्पुरुषों जैसा धर्म है। मृत्यु मानुषी भाव है और परनिन्दा असत्पुरुषों का सा आचरण है।”


यक्ष का अगला प्रश्‍न था- “क्षत्रियों में देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषों जैसा धर्म क्या है? मनुष्य भाव क्या है और असत्पुरुषों का सा आचरण क्या है?”

युधिष्ठिर बोले - शास्त्र विद्या ही क्षत्रियों में देवत्व है। उनका यज्ञ  ही सत्पुरुषों जैसा धर्म है।  भय उनका मनुष्य भाव है। शरण में आये लोगों का परित्याग करना ही  असत्पुरुषों का सा आचरण है।” 


यक्ष ने फिर पूछा- “कौन एक वस्तु यज्ञीय साम है? कौन एक वस्तु यज्ञीय यजुः है? कौन एक वस्तु यज्ञ का वरण करती है और किस एक का यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता?”

युधिष्ठिर बोले- “प्राण एक वस्तु यज्ञीय साम है। मन एक वस्तु यज्ञीय यजुः है। एक मात्र ऋचा  ही यज्ञ का वरण करती है और एक मात्र ऋचा का 

 ही यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता।”


 यक्ष का अगला प्रश्‍न था- खेती करने के लिए कोनसी वास्तु श्रेष्ठ है ? बिखेरने के लिए क्या श्रेष्ठ है ? प्रतिष्ठावान लोगों के लिए क्या श्रेष्ठ है? संतान उत्पादन करने वालों के  लिए क्या श्रेष्ठ है ?

युधिष्ठिर बोले- खेती करने वालों के लिए वर्षा श्रेष्ठ है। बिखेरने के लिए बीज श्रेष्ठ है।  अमीरों के लिए गौ पालन। और सन्तानो में पुत्र श्रेष्ठ है ।

  

यक्ष ने फिर पूछा- वह कोण है जो बुद्धिमान है? लोकों में सम्मानित है ? इन्द्रियों के विषय का अनुभव करता है ? तथा स्वांस भी लेता है परन्तु जीवित नहीं है?

युधिष्ठिर बोले- जो देवता, अतिथि, भ्रात्र जन, पितृ और आत्मा इन पाँचों का पोषण नहीं करता वह स्वांस लेने पर भी जीवित नहीं है। 

 

 यक्ष ने प्रश्न किया - पृथ्वी से भारी चीज क्या है? आकाश से भी ऊंचा कौन है? हवा से भी तेज चलने वाला कौन है? तिनको से भी अधिक क्या है ?

 युधिष्ठिर ने उत्तर दिया -  पृथ्वी से भारी चीज माँ है । आकाश से भी ऊंचा पिता है।  हवा से भी तेज चलने वाला मन है। तिनको से भी अधिक चिंता है। 



 यक्ष ने प्रश्न किया - कौन सोने पर भी आँखें नहीं मूँदता ? उत्पन होकर भी कौन चेष्टा नहीं करता ? किसमें ह्रिदय नहीं है ? कौन वेग से चलता है ?

 युधिष्ठिर ने उत्तर दिया - मछली सोने पर भी आँखें नहीं मूंदती। अंडा  उत्पन होकर भी चेष्टा नहीं करता।  पत्थर में  ह्रिदय नहीं है।  नदी वेग से चलता है  । 


 यक्ष ने प्रश्न किया - प्रवासी का मित्र कौन है ? घर में रहने वाले का साथी कौन होता है? रोगी का मित्र कौन है? मरणासन्न का मित्र कौन होता है?

 युधिष्ठिर ने उत्तर दिया - प्रवासी का मित्र  सहयात्री होता है।  घर में रहने वाले का साथी पत्नी होती है। रोगी का मित्र वैद्य है।   मरणासन्न का मित्र दान है ।


 यक्ष ने प्रश्न किया - समस्त प्राणियों का अतिथि कौन है ? सनातन धर्म क्या है ? अमृत क्या है ? यह सारा जगत क्या है?

 युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- अग्नि समस्त प्राणियों का अतिथि है ।  अविनाशी नित्य धर्म ही सनातन धर्म है। , गौ दूध अमृत है।, यह सारा जगत वायु  है। 



तोह मित्रों ये थे यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुए कुछ प्रश्न और उत्तर।  इसके बाद क्या हुआ ये हम आपको अगली वीडियो में बताएंगे। वीडियो को देखने के लिए आपका धन्यवाद।

टिप्पणियाँ