कैसे हुई भगवान शिव के तीसरे नेत्र की उत्त्पत्ति ?



 एक बार भगवन शिव हिमालय पर्वत पर तपस्या कर रहे थे।  हिमालय पर्वत बहुत सुन्दर था और जितने भी फल फूल इस धरती पर पाए जाते हैं वो सभी प्रकार के फल चरों तरफ उगे हुए थे और बहुत सुन्दर दिखाई प्रतीत हो रहे थे।  नाना प्रकार के फूल उस वन की  शोभा बढ़ा रहे थे। वहां कैलाश पर्वत पर भगवन शिव अपने भूतों के साथ बड़े प्रंसंता के साथ रह रहे थे।  वो भूत बहुत अजीब शकल के थे  हलाकि उनकी शकलें और उनकी आवाज़ें बहुत अजीब थी कोई सियारों जैसा था कोई चीते जैसा था कोई रीछ जैसा था कोई बेल के सामान था , लेकिन फिर भी वो सब बहुत आकर्षक जान पड़ता था और  वह दृश्य बहुत  ही मनमोहक प्रतीत होता था ।

 इसके अलावा बहुत सारे किन्नर , यक्ष , गन्धर्व राक्षस भी महादेव जी के साथ रहते थे।   शंकर जी की वो सभा बहुत ही सुन्दर और मन को कुश करने वाली दिखाई देती थी। कहने को तो वो जंगल था और बहुत अजीब अजीब से पेड़ और बहुत अजीब अजीब से जानवर और भूत गण वहां रहते थे परन्तु फिर भी वो स्वर्ग की इंद्र सभा से भी सुन्दर प्रतीत होती थी। वहां पे जो सुगंध थी वो दिव्य थी।  वहां पर तरह तरह के वाद्य यंत्रों की ध्वनियाँ गूंजती रहती थी।  

वहां पर जो शंखनाद फैले हुए होते थे और सारे गण और भूत मदमस्त होकर नृत्य कर रहे होते थे वो ऐसा दृश्य होता था की वह दृश्य देखने मात्रा से ही आदमी को मोक्ष प्राप्त हो जाये । वहां पर अप्सराएं नृत्य कर रही होती थीं , और उस जगह की सुंदरता अलौकिक और अद्भुत थी। बीच  में बैठ कर  भगवान शंकर तपस्या कर रहे थे जिस से उस पर्वत की शोभा और बढ़ रही थी।  सब तरफ से वेदों के पाठों की और शंखों की ध्वनियाँ गूँज रही थीं जो उस दृश्य की शोभा और भी बढ़ा रही थीं। यूँ तो वह पर्वत बहुत भयंकर था क्यूंकि वहां पर  बहुत घने वृक्ष थे और दूर दूर तक कोई मनुष्य या अन्य साधारण जीव  नहीं दिखाई देता था परन्तु फिर भी ऐसा लगता था की कोई उत्सव चल रहा है और वह दृश्य देख कर मन को बड़ी प्रसनत्ता होती थी।  

उस जगह को देख कर ऐसा लगता था मानो सारी ऋतुएं एक साथ  उस पर्वत पर आ गयी हों , मानो सारे  पुष्पों की सुगंध एक साथ उस पर्वत पर पहुँच गयी हो,  मानो सभी वाद्य यंत्रों की ध्वनियाँ एक साथ उस जगह पर आ गयी हो, मानो सारी सुन्दर अप्सराएं वहां पर नृत्य कर रही हों, मानो बहुत सारे ऋषि मुनि अपने वेदों की ध्वनियों से उस जगह को गूंजा रहे हों। यह सब होने पर भी मन  को जो शांति मिलती है उस से भी ज्यादा शांति उस दृश्य को देखने से मिलती थी।  वहां पर महादेव जी ऊँचे स्थान पर बैठ तपस्या में  मग्न थे बाकी सारे उनके भूत गण यक्ष, गन्धर्व और किन्नर नृत्य कर रहे थे और बहुत प्रसनत्ता  के साथ एक उत्सव वहां पे मना रहे थे। भगवन शिव एक सिंह  की चरम के ऊपर बैठे थे  और एक व्याग्र के चरम को वस्त्र के रूप में धारण किया हुआ था। उनकी गले में सर्प शोभा दे रहा था और  उनके हाथों में  रुद्राक्ष बाजूबंद के रूप में बंधा हुआ था।  उनके मस्तक पे जटा गुथी हुईं थी , उनके इस रूप को देख कर जहाँ दुष्टों के मन  काँप सकते थे वहीँ पर उनके भक्तों के लिए उस से  रमणीय दृश्य शायद कुछ और न हो । 

 वही एक रूप दुष्टों के मन  में भय उत्त्पन करने के लिए सक्षम था और वही रूप अत्यन शांति और ख़ुशी देने में सक्षम था।  वहां पर बहुत भयंकर काले सर्प घूम रहे थे।  जिस पर भी किसी को कोई संशय  न था। उसी समय उन भूतों की स्त्रियों से घिरी हुईं  गिरिराज हिमालय  नंदिनी उमा देवी एक तीर्थ स्थल के जल से भरा हुआ सोने का कलश ले कर भगवन शिव के पास आयीं। उन्होंने भी भगवान शिव की तरह ही वस्त्र धारण किये हुए थे। माता पारवती जी ने भगवान शिव को तपस्या में लीन देखा और आते ही उन्होंने हास परिहास के लिए मुस्कुराकर दोनों हाथों से एकदम भगवान शंकर के नेत्र पीछे से बंद कर लिए। भगवान् शंकर जो संपूर्ण जगत को धारण करने वाले हैं जिनके नेत्र से ही संपूर्ण जगत में प्रकाश है उनके दोनों नेत्रों पर  जैसे ही  पारवती जी ने हाथ रखा मानो जैसे सारा जगत अंधकार मय हो गया। सारे संसार की रौशनी ख़तम हो गयी और धरती पर सब तरफ  त्राहिमाम मच गया।  ऐसा जान पड़ा मानो सूर्य देव ही अपना स्थान छोड़ कर चले गए हों। वो दृश्य ऐसा था मानो संपूर्ण जगत में मरण छ गया हो। 

संपूर्ण जगत नष्ट होने की पराकाष्ठा  पर खड़ा हो। और सभी लोगों के मन में अशांति छा  गयी। तभी एकदम से सारे जगत का अंधकार दूर हो गया क्यूंकि भगवन शिव के माथे से एक अत्यंत ज्वलनशील महा ज्वाला प्रकट हो गयी जिसने पूरे संसार को रौशनी से जगमगा दिया। उनके माथे पे स्वयं भगवन सूर्य नारायण जैसा एक तीसरे नेत्र का  प्रादुर्भाव हो गया।  उस नेत्र से प्रलयाग्नि उत्पन प्रतीत होती थी। उस नेत्र से प्रकट हुए प्रकाश ने संपूर्ण जगत को प्रकाशमय कर दिया परन्तु  उसी नेत्र से उत्त्पन हुई ज्वाला ने उस पर्वत को जला दिया।  वह  सम्पूर्ण हिमालय उस ज्वाला से जलने लगा वहां पर जो मनोहर और भातिं भातिं के वृक्ष थे उन सभी वृक्षों में आग लग गयी और सारे जानवर भयभीत होकर इधर उधर भागने लगे। जो भी मृग , रीछ ,  सिंह,  व्याग्र आदि जीव उन जंगलों में रहते थे आग लगने के डर से महादेव जी के पास पहुंचे। वह  आग इतनी तेज़ हो गयी की आकाश को चूमने लगी। ऐसा प्रतीत होता था मानो एक साथ बहुत सारे सूर्य हिमालय पर्वत पर उतर आये हों। क्षण भर में ही पूरा हिमालय पर्वत जल कर राख होने की सीमा पर पहुँच गया।

 चारों ओर से बड़ी बड़ी लपटें उठने लगीं।  उस पर्वत को जलता देख पारवती देवी की स्तिथि काफी  दयनीय हो गयी।  क्यूंकि वे  स्वयं हिमालय की पुत्री थीं तो वो अपने पिता की इस तरह दशा नहीं देख पायीं और उन्होंने भगवन शंकर को बड़े दया भाव से देखा। वे बड़ी व्याकुलता से शिव जी से बोलीं हे भगवन यह  क्या हो  रहा है ? भगवन शंकर ने  सारे हिमालय पर्वत की तरफ प्रसन्ता पूर्वक दृष्टि से देखा। उनकी दृष्टि पड़ते ही संपूर्ण हिमालय पर्वत पूर्ववत स्तिथि में आ गया और देखने में परम सुन्दर हो गया। वहां पर पक्षी और पशु ख़ुशी से गुनगुना ने लगे , वृक्षों पर पुनः सुन्दर पुष्प खिल गए और सारा पर्वत पूर्ववत हो गया। हिमालय को पूर्व अवस्था में आते देख माता पारवती बहुत प्रसन हुईं और महादेव जी से पुछा "भगवन मेरे मन में एक बहुत बड़ा संशय उत्पन्न हुआ है कृपया करके मेरा वो संशय दूर करें। आपके ललाट से तीसरा नेत्र क्यों प्रकट हुआ और किस लिए ये  पशु पक्षी और वृक्ष जलने लगे और किस कारण आपने इन सबको पूर्व अवस्था में ला दिया। इसका क्या कारण है कृपया करके वह मुझे बताइये"। 

पारवती जी के ऐसा पूछने पर भगवन शंकर हस्ते हुए बोले हे प्रिये तुमने जो संशय प्रकट किया है वह उचित ही है। में तुम्हारी इस बात का उत्तर  देता हूँ सुनो।  जिस प्रकार ये  तीनो लोक भगवन विष्णु के आधीन हैं उसी प्रकार ये तीनो लोक मेरे भी आधीन है।  जैसे भगवन ब्रम्हा और  विष्णु तीनो लोकों के सृष्टा हैं उसी प्रकार मैं भी समस्त लोकों का स्वामी हूँ  । तो जिस प्रकार मेरा मनोभाव होता है उसी प्रकार जगत में शुभ या अशुभ कार्य होते हैं। देवी जब तुमने अपने भोलेपन के कारण मेरे दोनों नेत्र बंद कर दिए तब समस्त संसार का सारा प्रकश तत्काल नष्ट हो गया।  जब संसार से  सूर्य ही अदृश्य हो गया और सब जगह अंधकार ही अंधकार छा  गया तब मेने ही सृष्टि की रक्षा के लिए और लोगों के मन की शांति के लिए अपने तीसरे नेत्र का सृजन किया। यह  इसी तीसरे नेत्र का तेज़ था जिसने इस पर्वत को जला डाला। जब जब यह नेत्र खुलेगा तब वह प्रकाश भी प्रदान करेगा और ज्वाला भी। उसी ज्वाला और प्रकाश से समस्त संसार प्रकाशवान हो गया और समस्त लोगों के मन में शांति छा  गयी परन्तु यह हिमालय पर्वत भी जल गया।  क्यूंकि ये तुम्हारे बहुत प्रिये हैं इसी लिए मेने इसे पहले जैसा कर दिया 


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